नंगे पांव
चलते हुए
हरी दूब में थोडा घुलते हुए
सोने के एक टुकड़े सी झिलमिलाती
नन्ही बूद हो जाऊं
एक हलकी सी आंधी में
झरी हुई केरियाँ
बीनती नन्ही हथेलियाँ
और फटे हुए मैंले थैले
भरने का मासूम गर्व हो जाऊं
गोधुली में झुण्ड की झुण्ड
बजती घंटियाँ
ग्वाले की हांक से
पीछे उडती धूलहो जाऊं
तुलसी के चौरे में
साँझा बाती के साथ
एक हूँ सुर में गुनगुनाती
एक आवाज में छिपी प्राथना
और स्नेह हो जाऊं
दूर तक हवा में हिलती
सुनहली बालियों में इठला कर चलती
सोन चिरई के खिलावन के
चेहरे का संतोष हो जाऊं
अषाढ़ में भर आये
नरबे , बहते झरने
ओरिया से गिरते पानी में
बहती कागज की नाव
बोलते झींगुर ,टर टर करते गूलर हो जाऊं
क्यों न मैं एक गाँव हो जाऊं .

कविताओं में आपका दखल है ....यह तो मालूम था ही....पर यह भी बताना जरुरी लगा कि आप अच्छी फोटोग्राफर भी हैं....मैं गलत नहीं तो यह फोटू आपने ही खींची है ?....
जवाब देंहटाएंगीतू
hmmm lovly.
जवाब देंहटाएंखूबसूरत सी निर्दोष ख्वाहिशें..प्यारी सी कविता!!
जवाब देंहटाएंतो आप मुट्ठियों में आकाश समेट लेना चाहती हैं? अच्छी ख्वाहिशें हैं। लेकिन क्या सारी ख्वाहिशें पूरी हुई हैं किसी की?
जवाब देंहटाएंSensitive.....Creative....Innovative.....Self Discovery.....keep going......best wishes
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