शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

अनचीन्ही पगडंडियों से
नंगे  पांव
चलते हुए
हरी दूब में थोडा घुलते हुए
सोने के एक टुकड़े सी झिलमिलाती
नन्ही बूद हो  जाऊं 


एक हलकी सी आंधी में
झरी हुई केरियाँ
बीनती नन्ही हथेलियाँ
और फटे हुए मैंले थैले
भरने का मासूम गर्व हो जाऊं 

गोधुली में झुण्ड की झुण्ड
बजती घंटियाँ
ग्वाले की हांक से
पीछे उडती धूलहो जाऊं 

तुलसी के चौरे में
साँझा बाती के साथ
एक हूँ सुर में गुनगुनाती
एक आवाज में छिपी प्राथना
और स्नेह हो जाऊं

दूर तक हवा में हिलती
सुनहली बालियों में इठला कर चलती
सोन चिरई के खिलावन के
चेहरे का संतोष हो जाऊं 

अषाढ़ में भर आये
नरबे , बहते   झरने
ओरिया से गिरते पानी में
बहती कागज की नाव
बोलते झींगुर ,टर टर करते गूलर हो जाऊं
क्यों न मैं एक गाँव हो जाऊं .

5 टिप्‍पणियां:

  1. कविताओं में आपका दखल है ....यह तो मालूम था ही....पर यह भी बताना जरुरी लगा कि आप अच्छी फोटोग्राफर भी हैं....मैं गलत नहीं तो यह फोटू आपने ही खींची है ?....

    गीतू

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  2. खूबसूरत सी निर्दोष ख्वाहिशें..प्यारी सी कविता!!

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  3. तो आप मुट्ठियों में आकाश समेट लेना चाहती हैं? अच्छी ख्वाहिशें हैं। लेकिन क्या सारी ख्वाहिशें पूरी हुई हैं किसी की?

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  4. Sensitive.....Creative....Innovative.....Self Discovery.....keep going......best wishes

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